संवैधानिक पदाधिकारियों के भाषणों पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका, असम सीएम सरमा के बयानों को बताया असंवैधानिक

नई दिल्ली, जनमुख न्यूज़। संवैधानिक पदों पर बैठे नेताओं के सार्वजनिक भाषणों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक अहम याचिका दायर की गई है। याचिकाकर्ताओं ने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा समेत अन्य राज्यों के संवैधानिक पदाधिकारियों के बयानों को संविधान की भावना के खिलाफ और अपमानजनक बताया है। इस मामले में अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप और दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि हाल के दिनों में असम के मुख्यमंत्री ने ‘मिया मुसलमान’ समुदाय को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणियां कीं। इसके अलावा, कुछ समुदायों को सब्जियों की बढ़ती कीमतों, लव जिहाद और फ्लड जिहाद जैसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार ठहराया गया। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सीएम ने यहां तक कहा कि वह चुनावी मतदाता सूची से 4 से 5 लाख लोगों के नाम हटाना चाहते हैं, जो लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों के विपरीत है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि समस्या केवल असम तक सीमित नहीं है। अन्य राज्यों में भी उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे नेता इस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री द्वारा ‘लैंड जिहाद’ और ‘लव जिहाद’ जैसे शब्दों का प्रयोग और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा उर्दू भाषा समर्थकों के लिए कथित अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करने का उल्लेख किया गया है। वहीं, कुछ केंद्रीय मंत्री और वरिष्ठ अधिकारी मुसलमानों को घुसपैठिए या विदेशी समर्थक के रूप में पेश कर रहे हैं।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि भले ही ये बयान तकनीकी रूप से हेट स्पीच के दायरे में न आते हों, लेकिन ये संवैधानिक नैतिकता को कमजोर करते हैं और समाज में विभाजन पैदा करते हैं। उनका कहना है कि सार्वजनिक पदधारक सामान्य वक्ता नहीं होते, उनके शब्द राज्य की शक्ति और प्रशासनिक कार्रवाई को प्रभावित करते हैं तथा संवेदनशील समुदायों पर गहरा असर डाल सकते हैं।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट के अहम फैसलों—नवतेज सिंह जोहर बनाम भारत संघ (2018), जोसेफ शाइन बनाम भारत संघ (2019) और एनसीटी दिल्ली सरकार बनाम भारत संघ (2018)—का हवाला देते हुए कहा गया है कि संवैधानिक नैतिकता को लोकप्रिय भावना पर हमेशा प्राथमिकता दी जानी चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने यह भी रेखांकित किया कि फिलहाल संवैधानिक पदों पर बैठे अधिकारियों के भाषणों को नियंत्रित करने के लिए कोई स्पष्ट मानक या दिशा-निर्देश मौजूद नहीं हैं, जिससे भेदभावपूर्ण और अपमानजनक भाषणों को बढ़ावा मिल रहा है।
याचिका में सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया गया है कि वह ऐसे दिशानिर्देश जारी करे, जिनके तहत संवैधानिक पदाधिकारियों के सार्वजनिक भाषण समानता, बंधुत्व, धर्मनिरपेक्षता और संविधान के अनुच्छेद 14 व 21 के अनुरूप हों, साथ ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी संरक्षण किया जाए।
इस याचिका पर हस्ताक्षर करने वालों में डॉ. रूप रेखा वर्मा, मोहम्मद अदिब, हर्ष मंडर, दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब हामिद जंग, डॉ. जॉन डेअल, दया सिंह, अदिति मेहता, सुरेश के गोयल, अशोक कुमार शर्मा और सुभोद लाल शामिल हैं। वहीं, हाल ही में जमीयत उलमा-ए-हिंद ने भी असम के मुख्यमंत्री के भाषणों की निंदा करते हुए सुप्रीम कोर्ट से दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की है।

इसे भी पढ़े-
कश्मीर और हरियाणा में चुनाव का हुआ ऐलान

नई दिल्ली, जनमुख न्यूज़। निर्वाचन आयोग ने आज (शुक्रवार को) तीन बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त Read more

बिहार में अगुवानी सुल्तानगंज ब्रिज का एक हिस्सा ढह गया।

पटना, जनमुख न्यूज। बिहार में गंगा नदी पर निर्माणाधीन अगुवानी-सुल्तानगंज पुल का एक हिस्सा शनिवार सुबह ढह गया। खगड़िया के Read more

कोलकाता रेप मर्डर केस – ममता बनर्जी के मार्च पर भाजपा का तंज

कोलकाता जनमुख न्यूज। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने प्रशिक्षु डॉक्टर के बलात्कार और हत्या मामले पर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Read more

नेपाल की विदेश मंत्री आरजू राणा देउबा भारत की पांच-दिवसीय यात्रा पर पहुंचीं

नेपाल, जनमुख न्यूज। नेपाल की विदेश मंत्री आरजू राणा देउबा द्विपक्षीय संबंधों की व्यापक समीक्षा करने के उद्देश्य से पांच-दिवसीय Read more

Spread the love

Related articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *