महाशिवरात्रि पर 11 पवित्र काष्ठों के विशेष पट्ट पर विराजेंगे काशीपुराधिश्वर, हल्दी-सगुन से शुरू होंगे मांगलिक अनुष्ठान
वाराणसी, जनमुख न्यूज़। देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में महाशिवरात्रि का पर्व इस वर्ष विशेष आध्यात्मिक महत्व के साथ मनाया जाएगा। परंपरानुसार काशीपुराधिश्वर भगवान विश्वनाथ नवग्रहों से संबंधित 11 प्रकार की पवित्र लकड़ियों से निर्मित विशेष काष्ठपट्ट पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देंगे।
महाशिवरात्रि से पूर्व शुक्रवार को हल्दी और सगुन के लोकाचार के साथ मांगलिक अनुष्ठानों की शुरुआत होगी। टेढ़ीनीम स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत आवास पर तैयारियां अंतिम चरण में हैं। परंपरा के अनुसार बाबा विश्वनाथ और माता गौरा की चल प्रतिमाओं को विधि-विधान से काष्ठपट्ट पर स्थापित कर धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराए जाएंगे।
नवग्रहों से जुड़ी पवित्र लकड़ियों का विशेष महत्व
महंत वाचस्पति तिवारी ने बताया कि काशी की परंपराओं में शास्त्र, प्रकृति और लोकजीवन का समन्वय देखने को मिलता है। इसी क्रम में इस वर्ष तैयार काष्ठपट्ट नवग्रहों से संबंधित पवित्र वृक्षों और वनस्पतियों की लकड़ियों से बनाया गया है। धार्मिक मान्यता है कि इन काष्ठों का उपयोग ग्रहशांति, सकारात्मक ऊर्जा और लोककल्याण का प्रतीक माना जाता है।
नवग्रहों के अनुरूप सूर्य के लिए अर्क (मदार), चंद्र के लिए पलाश, मंगल के लिए खदिर (खैर), बुध के लिए अपामार्ग, गुरु के लिए पीपल, शुक्र के लिए औदुम्बर (गूलर), शनि के लिए शमी, राहु के लिए दुर्वा और केतु के लिए कुशा का चयन किया गया है। इसके अतिरिक्त अक्षोड (अखरोट) और सागवान की लकड़ी को शामिल कर कुल 11 प्रकार के पावन काष्ठों से यह विशेष पट्ट तैयार किया गया है।
देशभर की आस्था का संगम
इस काष्ठपट्ट के निर्माण में केवल काशी ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों की सहभागिता रही है। उत्तर प्रदेश के अलावा राजस्थान, कश्मीर, उत्तराखंड, बिहार और असम से पवित्र लकड़ियां एकत्र की गईं। शिवभक्तों ने श्रद्धापूर्वक इन्हें महंत आवास तक पहुंचाया, जहां पारंपरिक विधि से काष्ठपट्ट को अंतिम रूप दिया गया।
निर्माण में आधुनिक सजावट से परहेज करते हुए शास्त्रीय मर्यादाओं और काशी की लोकसंस्कृति का विशेष ध्यान रखा गया है।
हल्दी-सगुन से महाशिवरात्रि तक विशेष आयोजन
काशी में महाशिवरात्रि केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि कई दिनों तक चलने वाली धार्मिक परंपराओं की श्रृंखला है। शुक्रवार को हल्दी और सगुन के साथ शुभारंभ होगा, जिसके बाद महाशिवरात्रि के दिन बाबा विश्वनाथ और माता गौरा का विशेष श्रृंगार, पूजन और लोकाचार संपन्न किया जाएगा।
मान्यता है कि इन अनुष्ठानों के माध्यम से काशीपुराधिश्वर भक्तों के जीवन से कष्टों का निवारण कर सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
शिवाजंली के संयोजक संजीव रत्न मिश्र ने कहा कि काशी की पहचान उसकी जीवित लोकपरंपराओं से है। 11 पावन काष्ठों से बने विशेष आसन पर बाबा का विराजमान होना प्रकृति, देवत्व और मानव जीवन के गहरे संबंध का प्रतीक है।
महाशिवरात्रि पर यह अनुष्ठान शिवभक्तों के लिए अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव का अवसर बनेगा।

