बुढ़वा मंगल पर अस्सी घाट गुलाब की खुशबू से महका, काव्य-संगीत से सजी लोक संस्कृति की अनूठी झलक

वाराणसी, जनमुख न्यूज़। काशी की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा के प्रतीक बुढ़वा मंगल पर्व पर अस्सी घाट लोकमंगल की कामना से गूंज उठा। सुबह-ए-बनारस आनंद कानन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में काव्य, सम्मान और संगीत के तीन आयाम—काव्य मंगल, सम्मान मंगल और सुर मंगल—के जरिए लोक संस्कृति का भव्य उत्सव मनाया गया। इस दौरान उपस्थित लोगों पर 51 क्विंटल गुलाब के फूलों की पुष्प वर्षा की गई।
काव्य मंगल सत्र में 12 कवियों और 12 कवयित्रियों ने कविता, गीत, ग़ज़ल, छंद और मुक्तक के माध्यम से फागुन के रंगों और लोकमंगल की भावना को अभिव्यक्त किया। कार्यक्रम की शुरुआत स्वर्गीय पं. अशोक मिश्र ‘सामयिक’ द्वारा रचित बुढ़वा मंगल की आरती “ऊँ जय बुढ़ऊ बाबा…” से हुई, जिसे सामूहिक रूप से प्रस्तुत किया गया।
वहीं, सुर मंगल सत्र में डॉ. विजय कपूर और डॉ. मधुमिता भट्टाचार्य ने लोक और उपशास्त्रीय संगीत की मनमोहक प्रस्तुतियां दीं। चैती, होरी और दादरा की मधुर धुनों ने श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। गुलाब की पंखुड़ियों और गुलाब जल की वर्षा के बीच आयोजित इस सत्र ने पूरे वातावरण को सुगंधित और उत्सवमय बना दिया।

