यूपी के संविदा शिक्षकों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, 7 हजार पर काम ‘बेगार’ बताया

नई दिल्ली, जनमुख न्यूज़। उत्तर प्रदेश के उच्च प्राथमिक विद्यालयों में कार्यरत हजारों संविदा शिक्षकों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि लंबे समय तक केवल 7 हजार रुपये मासिक मानदेय पर शिक्षकों से काम कराना अन्यायपूर्ण है और यह संविधान के तहत ‘बेगार’ यानी जबरन श्रम की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार की अपील को खारिज करते हुए शिक्षकों के हक में अहम फैसला सुनाया है।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने आदेश दिया कि संविदा शिक्षक वर्ष 2017-18 से 17 हजार रुपये मासिक मानदेय पाने के हकदार हैं। अदालत ने कहा कि 11 महीने के अनुबंध की आड़ में साल-दर-साल शिक्षकों से काम लेना और मानदेय में कोई बढ़ोतरी न करना गलत श्रम व्यवहार है। कोर्ट ने निर्देश दिया कि राज्य सरकार 1 अप्रैल 2026 से 17 हजार रुपये प्रतिमाह के हिसाब से भुगतान शुरू करे और बकाया राशि छह महीने के भीतर चुकाई जाए।
अदालत ने यह भी कहा कि जो शिक्षक लगातार 10 साल या उससे अधिक समय से काम कर रहे हैं, उन्हें व्यवहार में स्थायी माना जाएगा। कोर्ट के अनुसार, पद लगातार बने हुए हैं और शिक्षकों से निरंतर काम लिया जा रहा है, ऐसे में कार्य की प्रकृति स्थायी है। सिर्फ संविदा का नाम देकर कम वेतन देना उचित नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मानदेय को हमेशा के लिए 7 हजार रुपये पर तय रखना संविधान के अनुच्छेद 23 का उल्लंघन है, जो बेगार और जबरन श्रम पर रोक लगाता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षकों के मानदेय की समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए और कम से कम हर तीन साल में उसमें संशोधन जरूरी है।
मामले की पृष्ठभूमि में बताया गया कि राज्य में सर्व शिक्षा अभियान के तहत वर्ष 2013 में कक्षा 6 से 8 के लिए पार्ट टाइम संविदा शिक्षकों की भर्ती की गई थी। इन्हें 11 महीने के अनुबंध पर 7 हजार रुपये मानदेय पर रखा गया और शर्त थी कि वे कोई अन्य नौकरी नहीं करेंगे। अनुबंध समाप्त होने के बावजूद हर साल नवीनीकरण होता रहा, लेकिन मानदेय में कोई बढ़ोतरी नहीं की गई। इससे आक्रोशित होकर शिक्षकों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की एकल पीठ ने 2017 से 17 हजार रुपये मानदेय देने का आदेश दिया था, जिसे बाद में खंडपीठ ने सीमित अवधि तक लागू किया। इसके खिलाफ राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी, लेकिन अब शीर्ष अदालत ने राज्य की अपील को पूरी तरह खारिज कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि शिक्षा राष्ट्र निर्माण की नींव है और शिक्षक समाज में सर्वोच्च सम्मान के पात्र हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि शिक्षकों को भुगतान की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकार की होगी, जबकि बाद में वह केंद्र सरकार से अपनी हिस्सेदारी वसूल कर सकती है।

