29 साल पुराने कस्टोडियल डेथ केस में फैसला: वाराणसी कोर्ट ने बाल रोग विशेषज्ञ समेत तीन को ठहराया दोषी

वाराणसी, जनमुख न्यूज़। लंका थाना पुलिस हिरासत में 29 वर्ष पूर्व हुई राजेंद्र प्रसाद सिंह की मौत के मामले में वाराणसी की विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण) अमित कुमार तिवारी की अदालत ने सोमवार को अहम फैसला सुनाया। अदालत ने प्रसिद्ध बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. के.के. जैन, सेवानिवृत्त दरोगा नरेंद्र प्रताप सिंह और राधेश्याम सिंह को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई। अदालत ने डॉ. के.के. जैन को पांच वर्ष के कारावास और 40 हजार रुपये जुर्माने, तत्कालीन दरोगा नरेंद्र प्रताप सिंह को दस वर्ष के कारावास एवं 31 हजार रुपये जुर्माने तथा राधेश्याम सिंह को छह माह के कारावास और एक हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। न्यायालय ने निर्देश दिया कि जमा किए जाने वाले जुर्माने की 50 प्रतिशत राशि मृतक के परिजनों को दी जाएगी।अभियोजन पक्ष के अनुसार, जंसा थाना क्षेत्र के बखरिया गांव निवासी राजेंद्र प्रसाद सिंह 5 फरवरी 1997 को अपने बेटे की दवा लेने वाराणसी आए थे। सुंदरपुर के पास बस में सीट को लेकर हुए विवाद के बाद तत्कालीन दरोगा नरेंद्र प्रताप सिंह उन्हें पुलिस चौकी ले गए और उन पर जेब से सौ रुपये चोरी करने का आरोप लगाया। उसी दिन शाम को पुलिस हिरासत में उनकी मौत हो गई। मृत्यु के बाद पुलिस ने राजेंद्र के खिलाफ चोरी का मुकदमा दर्ज किया और जांच अधिकारी राधेश्याम सिंह ने मामले को आत्महत्या बताते हुए रिपोर्ट तैयार की। पुलिस का दावा था कि राजेंद्र ने शॉल के सहारे पंखे से फांसी लगाकर आत्महत्या की थी। अगले दिन बीएचयू में पोस्टमार्टम कराया गया, जिसमें डॉ. के.के. जैन ने दम घुटने से मौत होने की रिपोर्ट दी।
हालांकि बाद में सीबीसीआईडी जांच में कई गंभीर विसंगतियां सामने आईं। जांच में न तो कथित शॉल मिला और न ही उस बैरक में पंखा होने की पुष्टि हुई। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भी कई महत्वपूर्ण तथ्यों का उल्लेख नहीं था। इतना ही नहीं, मृतक के परिजनों को सूचना दिए बिना ही पुलिस ने हरिश्चंद्र घाट पर उनका अंतिम संस्कार भी करा दिया था।
मृतक की पत्नी शशिमा देवी ने न्याय की मांग को लेकर मानवाधिकार आयोग का दरवाजा खटखटाया। आयोग के हस्तक्षेप के बाद मामले की जांच सीबीसीआईडी को सौंपी गई। जांच के आधार पर 1998 में मुकदमा दर्ज हुआ और वर्षों तक चली सुनवाई के बाद अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और परिस्थितिजन्य प्रमाणों के आधार पर तीन आरोपियों को दोषी ठहराया।मामले में कुल 11 लोगों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया गया था।
सुनवाई के दौरान कुछ आरोपियों की मृत्यु हो गई, जबकि दो कांस्टेबलों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया। अदालत ने अंततः डॉ. के.के. जैन, नरेंद्र प्रताप सिंह और राधेश्याम सिंह को दोषी मानते हुए सजा सुनाई।करीब तीन दशक पुराने इस मामले में आए फैसले को कस्टोडियल डेथ से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय माना जा रहा है।

